स्वतन्त्रता दिवस …

निम्नलिखित मेरे विचार हैं, जो मैंने १५ अगस्त पर IIIT-H में हुए समारोह में अध्यापकों, विद्यार्थियों तथा अन्य लोगो के समक्ष प्रस्तुत किए| Dr. A.P.J Abdul Kalam भी उस दिन वहां उपहस्थित थे|

आज स्वतंत्रता दिवस है| आज के दिन हम अग्रेजों की अधीनता से मुक्त हुए थे| आज का ही वह दिन था, जब हमें राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी| यह राजनैतिक स्वतंत्रता हमें यूँ ही प्राप्त नहीं हुई, इसे प्राप्त करने के लिए हज़ारों लोगों ने अपने निजी स्वार्थ को दरकिनार कर अपने प्राणों की खुशी खुशी आहुति दे दी|

आज स्वतंत्रता के ६० वर्ष बाद हम कहते हैं की हम स्वतंत्र हैं| स्वतंत्रता का अर्थ हम राजनैतिक स्वतंत्रता से लगाते हैं, पर क्या राजनैतिक रूप से स्वतंत्र होना ही, स्वतंत्रता है? राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर के हम मानते हैं की हमने स्वराज हासिल कर लिया है, पर क्या यह सही मायने में स्वराज है?

इस जगह पर आकर हमें स्वतंत्रता तथा स्वराज, इन शब्दों को परिभाषित करने की आवश्कता महसूस होती है| स्वराज को पूर्ण रूप से परिभाषित कर पाना मेरे ज्ञान तथा योग्यता के परे है, पर तब भी में एक मोटे स्तर पर यह कहना चाहूँगा की स्वराज का अर्थ है, समाज में सुख तथा सम्रद्धि अथवा समाज में व्यवस्था| जब हम समाज में व्यवस्था को सुनिशचित करने जाते हैं, तो हम पाते हैं की समाज में व्यवस्था, मनुष्य के स्तर पर व्यवस्था को सुनिशचित किए बिना नहीं लाई जा सकती| मनुष्य के स्तर पर सुख तथा सम्रद्धि अथवा व्यवस्था सुनिशचित करने के लिए हमें मनुष्य के स्तर पर व्यवस्था को समझने की आवश्यकता है| मनुष्य के स्तर पर व्यवस्था को केवल स्वाध्याय से ही समझा जा सकता है| किसी गुमनाम व्यक्ति ने स्वाध्याय की महत्ता को बड़े ही अच्छे ढंग से समझाया है, जो में आप सबके साथ में बाँटना चाहूँगा|

यह कुछ इस तरह से है,
स्वयं से बातें करना हमेशा से ही मेरा काम रहा है| स्वयं से बातें करते करते अक्सर में दो “मैं” में बट जाता हूँ| एक वह “मैं” जो में होना चाहता हूँ, जिसकी मैंने अपने मन में छवि बाना रखी है, और दूसरा वह “मैं” जो में असलियत में हूँ| ऐसा करके मैं पाता हूँ की मेरे उन दो रूपों में कितना अन्तर है, कितना मतभेद है !! यह भीतरी मतभेद ही है जो आतंरिक हिंसा को जन्म देता है और अंततः बाहरी हिंसा के रूप में अपने आपको प्रदर्शित करता है|

काफ़ी लंबे समय से में इसी उलझन में पड़ा रहा की मेरे उन दो “मैं” में इतना अन्तर कैसे है, और मैं उसे आसानी से क्यों खत्म नहीं कर पा रहा हूँ? और भी कई प्रश्न मेरे इस अशांत मन को और भी विचलित कर देते, जैसे, आख़िर इस जीवन का उद्देश्य क्या है? हम क्या करना चाहते हैं?, आदि| मुझे पिछले कुछ समय से बस यही बात समझ मैं आई की इन प्रश्नों के उत्तर मुझे स्वाध्याय से ही मिल सकते हैं| स्वाध्याय ही मुझे बता सकता है की मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, मेरी भौतिक, मानसिक आवश्यकताएं क्या हैं|

मेरी ऐसी धारणा बनी की इन प्रश्नों के उत्तर के आभाव में और जीवन के प्रयोजन से जुड़े ज्ञान के आभाव में ही, हम स्वयं को उद्देश्यहीन पाते हैं और अक्सर वाही कर बैठते हैं जो हमारे समाज में अन्य लोग कर रहे होते हैं| और इस तरह से हम राजनैतिक रूप से स्वतंत्र होकर भी परतंत्रता का जीवन व्यतीत करते रहते हैं|

स्वाध्याय से मुझे यह पता लगा की मैंने अपने अभी तक के जीवन में जो भी कुछ अपने अन्दर ज्ञान समझ कर भर रखा है, वह सही में ज्ञान है, या फ़िर मेरी मान्यता है? मैंने यही पाया की हमें हमारी मान्यताओं और ज्ञान अथवा सही समझ के प्रति जागरूकता अत्यन्त ही आवश्यक है| ज्ञान तथा मान्यताओं को प्रथक करने वाली रेखा मुझे स्पष्ट रूप से दिखाई पड़नी चाहिए| हमारा व्यवहार हमारी मान्यताओं तथा ज्ञान का दर्पण होता है| हमारी मान्यताएं व ज्ञान हमारे व्यवहार को परिवर्तित कर देते हैं, हमारे नज़रिये को बदल कर रख देते हैं| एक ग़लत मान्यता का होना एक रंगीन चश्मे को लगा लेने जैसा है| अब भाई, लाल रंग का चश्मा लगा कर देखोगे तो दुनिया लाल ही नज़र आएगी ना!!

स्वाध्याय से ही मुझे समझ आया की समझ का आभाव ही सभी दुखों का कारण है| अज्ञानतावश ही मनुष्य गैरजिम्मेदाराना व्यवहार करता है| ज्ञान का अर्थ है, स्वयं के सम्पूर्णता से सम्बन्ध की समझ, जो स्वयं की समझ के बिना नहीं आ सकती| इसी समझ के आभाव में मनुष्य स्वयं भी दुखी होता है, और अन्य लोगों को भी दुखी कर बैठता है| अज्ञानता ही सभी दुखों का कारण है|

आज जब में अपने आसपास देखता हूँ, तो पाता हूँ, की चारों ओर भष्टाचार का बोलबाला है| सुधार की अवश्यक्ता है| इस सब भष्टाचार की जड़ अज्ञानता ही है| जब तक अज्ञानता ख़त्म नहीं होगी, तब तक भष्टाचार नामक इस राक्षस का वध नहीं होगा| जब तक हम स्वयं में सुधार नहीं लाएंगे तब तक हम समाज, देश, तथा विश्व के सुधार की आशा नहीं कर सकते| हर वह प्रयास जो अज्ञानता को मिटाकर ज्ञान बांटने में समर्थ है, सुधार कार्य की तरफ़ बहुत ही अच्छा और भव्य प्रयास है|

आज स्वतंत्रता दिवस है| आज के दिन हम अंग्रेजों की अधीनता से मुक्त हुए थे, पर मैं इस आजादी को सही मायने में आजादी नहीं मानता| हम तब तक आज़ाद नहीं होंगे, जब तक हम इन अज्ञानता रुपी बेड़ियों को तोड़कर स्वतंत्र नहीं हो जाते|

आइये हम सब आगे आयें और सभी में ज्ञान रुपी इस ज्योति को प्रज्वलित करने का यथासंभव प्रयास करें|
जय हिंद|

Published in: Uncategorized on August 23, 2007 at 10:57 am Comments (1)

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  1. nice … !! आज कल इतनी अच्छी हिंदी कहॉ सुनने को मिलती है !!


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