जब भी मुझे यह महसूस होता है की मेरे किसी प्रियजन के मन में मेरे प्रति अस्वीकृति का भाव है, या उनके मन में मेरे प्रति स्वीकृति में अनिश्चितता आ गई है तो में परेशान हो जाता हूँ| अपने प्रियजनों से स्वीकृति की भूख मुझ में हमेशा ही बनी रहती है| यह एक ऐसी भूख है जो मेरी भोजन की भूख से बिल्कुल अलग है| भोजन की भूख को तों में फिर भी थोडी देर बर्दाश्त कर सकता हूँ, पर अस्वीकृति से मिलने वाली निराशा को एक पल भी नहीं| बल्कि उस अस्वीकृति से मिली निराशा को अच्छा स्वादिष्ट भोजन भी शांत नहीं कर सकता| सब कुछ नीरस लगाने लगता है| काम में मन नहीं लगता| ऐसी है इस अस्वीकृति की प्रताड़ना|
मेरी मेरे प्रियजनों से ऐसी आशा रहती है की वे मुझे स्वीकार लें और स्वीकारें ही रहे| अगर मुझे अपने प्रियजनों से स्वीकृति में जरा सी भी अनिश्चितता महसूस होती है तो मेरे मन मैं कई सारे सवाल खड़े हो जाते हैं| “पता नहीं क्या हो गया?”, “कहीं उन्हें मेरी उस बात का बुरा तो नहीं लगा”, “ना जाने क्या चल रहा है उनके मन मैं मेरे लिए” इस तरह के प्रश्नों तथा अनिश्चितताओं से मैं घिरा रहता हूँ| मैं, मैं नहीं रहता| मैं उनकी स्वीकृति पाने के लिए कुछ और हो जाता हूँ, कुछ भी करने को तैयार हो जाता हूँ| ऐसा असर है इस अस्वीकृति की भावना का|
अक्सर ऐसा देखने में आया है की मेरे मन में ये अपने प्रियजन से अस्वीकृति का भय तब आता है, जब मेरे किसी प्रियजन का कार्य या व्यवहार मेरे प्रति बदलने लगता है| उनके कार्य और व्यवहार में बदलाव ही मेरे मन में अनिश्चितता पैदा करता है| उस अनिश्चितता से मेरे मन में उनके प्रति संदेह उत्पन्न होता है की कहीं उनके मन में मेरे प्रति कोई ग़लत अवधारणा तो नहीं आ गई? वो संदेह मेरे मन में भय उत्पन्न करता है, संबध खो देने का भय, अस्वीकार कर दिए जाने का भय, ग़लत समझे जाने का भय| वह भय ही मेरे दुःख का कारण बनता है|
यहाँ पर देखने में यह आता है कि मेरे प्रियजनों का कार्य व्यवहार बदलने पर मेरे मन में भय उत्पन्न होता है व सम्बन्ध के प्रति मेरे मन में अनिश्चितता उत्पन्न होती है| ऐसा अक्सर इसलिए होता है क्योकि सम्बन्ध के प्रति मेरे मन में स्वीकृति का आधार सामने वाले व्यक्ति का कार्य और व्यवहार बना रहता है| जब तक उनका कार्य और व्यवहार मेरे प्रति अच्छा बना रहता है तब तक मैं उन्हें स्वीकारे रहता हूँ परन्तु थोड़ा सा भी बदलाव आने पर मेरे मन में उनके प्रति अस्वीकृति का भाव आ जाता है| मेरे मन में आया अस्वीकृति का भाव ही मेरे दुःख का कारण बनता है| जैसे जब एक छोटा बच्चा जब मुझसे दुर्व्यवहार करता है तो मुझे दुःख नहीं पहुचाता, मुझे यह समझ मैं आता है कि वह अभी समझदार नहीं है इसलिए मुझसे ऐसा व्यवहार कर रहा है, जबकि जब कोई बड़ा व्यक्ति मुझसे दुर्व्यवहार करता है तब मेरा संदेह उसकी चाहना पर चला जाता है कि “वह व्यक्ति मुझे दुःख पहुचना चाहता था!”| जैसे ही मैं चाहना पर संदेह करता हूँ मुझे दुःख पहुचता है|
दूसरे व्यक्ति की चाहना के प्रति पूर्ण आश्वस्ति कहलाती है, विश्वास| जब मेरे मन में थोड़ा सा भी अविश्वास उत्पन्न होता है में परेशान हो जाता हूँ| जब भी में दूसरे व्यक्ति की चाहना पर संदेह करता हूँ, मुझे दुख पहुचाता है| दूसरे व्यक्ति की चाहना को समझने के लिए मुझे एक मनुष्य के मूल स्वरुप को समझने की जरूरत है, उसकी मूल चाहना को समझने की जरूरत है| मनुष्य की मूल चाहना को स्वाध्याय से ही समझा जा सकता है| उसके उपरांत ही मैं एक मनुष्य पर विश्वास कर सकता हूँ| उसके पहले मेरे विश्वास मैं निश्चितता नहीं होती, और मैं भय व दुःख से पीड़ित रहता हूँ|
इंसान अपने जीने के हर आयाम में सुख, सुख की निश्चितता व उस निश्चितता की निरंतरता चाहता है| मनुष्य सुख, शान्ति, संतोष, आनंद चाहता है| स्वयं के विचारों में सामरस्यता व समाधान, संबंधों में उभय तृप्ति, समाज में अभय व प्रकृति में सह-अस्तित्व, मनुष्य की मूल चाहना है| जीवन मैं सुख से जुड़े सवालों के उत्तर पाने के लिए और सुखी हो जाने के लिए मनुष्य को ज्ञान चाहिए| ज्ञान के तीन स्तर हैं,
१. स्वयं का ज्ञान|
२. अस्तित्व का ज्ञान|
३. मानवीयता पूर्ण आचरण का ज्ञान|
Debu Maharaj Rocks
waise kuch kuch hi samajh aaya
Nice observations!!
What I’ve inferred from the post is:-
In general, we evaluate a person based on his ‘work’ and ‘behavior’.
If the person behaves well with me, I feel the persons accepts me the way I’m and feel comfort zone whenever he/she is around. If for some reason(unknown to me) his behavior with me changes I feel the person doesn’t accept me the way I’m.
Due to the lack of understanding of the others intention behind the change in his behavior we feel bad.
We to the best of our understanding try to resolve the situation:-
For e.g. sometimes I start avoiding other person just to ensure my comfort as I don’t see any solution to the problem, this is the best I can do.
But why all this, wots the purpose of avoiding?
Answer:To ensure my happiness.
But is happiness being ensured avoiding the person whose behavior towards me has changed or is it just that in absence of solution to the problem I’m doing it?
Answer: In absence of solution I’m doing it.
It’s always the absence of solution or lack of understanding which motivates us to take such steps such as avoiding the person.
But the real and permanent solution lies in, understanding the intention of the person whose behavior towards me has changed.
i.e. for what purpose the person’s is behaving in such and such a way with me?
Coming to right answer of the above question, is only possible if I know the answer to following questions:-
“Why does my behavior towards others change?”
“What is the basis for such a sudden change in my behavior, what will I achieve by my such a change in the behavior?”
When I answer all these questions for myself, I also see same is true for others too.
Why such an exercise, pain to understand others intention?
This is a very obvious question why take all the pain to understand others intention.
Answer: ‘coz i feel uncomfortable when others behavior towards me change, and i don’t get answer of why to it.(the very problem addressed in the post. (refer paragraph1) )
PS: Nice topic to write on, अस्वीकृति (Rejection) is problem faced by every other being but due to lack of understanding we fail to resolve it.