कई दिनों से मैं अपने मन में होने वाली गतिविधियों को देखने का प्रयास कर रहा था| किस तरह से मन एक जगह से दूसरी जगह भागता है| मन में पिजा का ध्यान आया, पिजा से पिजा हट का ध्यान आया, पिजा हट में जब पिछली बार गए थे तब का दिन याद आ गया, उस दिन मैं काफ़ी परेशान था फिर यह ध्यान आया, परेशानी का कारण तो मैंने पहले ही ढूँढ निकाला था वह परेशानी मुझे जब कभी पहले आई थी वह सब पल मेरी आंखों के सामने आ गए, और जब मुझे होश आया तो मैंने पाया की में पिछले १ घंटे से बेहोश था| एक घंटे तक मैं अपने मन की गतिविधियों को देख रहा था| किस तरह से एक से दूसरी कड़ी जुड़ती गई, किस तरह से मन एक जगह से दूसरी जगह भागता गया, किस तरह से नए नए विचार मेरे मन में अपने आप आते रहे और ख़ास बात यह थी की यह सब अपने आप ही हो रहा था, मैं तो बस देख रहा था| चित्र अपने आप बदल रहे थे, उन चित्रों मैं आवाजें भी थी, वह भी मुझे साफ सुने दे रही थी| ऐसा लग रहा था की मनो मैं कोई चलचित्र देख रहा हूँ, जिसका मैं हीरो हूँ|
कई बार ऐसा भी होता है की मन में आई किसी वस्तु से मुझे उससे मिलने वाले स्वाद का ध्यान आ जाता है और मेरे मन में उस वस्तु से उस स्वाद को पाने की इच्छा जागृत हो उठती है| जैसे पिजा का ध्यान आने पर उससे मिलने वाले स्वाद का आस्वादन मैं अपने मन में लेता हूँ और फिर मुझे पिजा खाने की तलब उठती है| पिजा का ध्यान आने पर पिजा का स्वाद तथा उसका चित्र मेरे मन मैं स्वतः ही आ जाता है| यहाँ पर पिजा तो केवल एक उधाहरण है, ऐसा मेरे साथ हर उस वस्तु के लिए होता है जिससे मुझे अच्छा स्वाद मिला हो और जिससे मुझे वह स्वाद दोबारा मिलने की आशा हो| यहाँ पर यह भी देखने की बात है की यह स्वाद मुझे केवल खाने पीने की चीजों में ही नहीं, बल्कि कई अन्य चीजों मे भी मिलता है| जैसे किसी प्रियजन के साथ बिताये गए अच्छे समय का स्वाद या आस्वादन| अपने प्रियजनों के साथ बिताये गए अच्छे समय की यादें तथा उस समय लिया गया स्वाद अथवा आस्वादन मेरे मन में बना रहता है| जैसे ही मुझे वह पल याद आते हैं, मैं अपने मन में वह आस्वादन बिना उन पलों मे हुए भी लेने लगता हूँ और फिर वैसे ही पल दोबारा से पाने की इच्छा रखता हूँ| इस तरह से यह देखने मे आता है की यह स्वाद या आस्वादन मुझे कई जगहों से मिलता है, खाने पीने से, घूमने फिरने से, टीवी देख कर, अपने प्रियजनों से बातें कर के, उनके साथ अच्छा समय बिता कर तथा कई अन्य वस्तुओं से| इतना सब कुछ मेरे मन मे चलता रहता है, मुझ मे इतनी सारी इच्छाओं को जन्म देते रहता है, मुझ से इतना कुछ कराते रहता है|
यहाँ पर यह देखने में आता है की यह स्वाद पाने की आशा मेरे मन में हमेशा ही बनी रहती है| में निरंतर किसी ना किसी वस्तु से स्वाद पाने की आशा रखता हूँ| जिस वस्तु का स्वाद मुझे अच्छा नहीं लगता उसे में अपने से दूर कर देना चाहता हूँ और जिस वस्तु का स्वाद मुझे अच्छा लगा हो या लगता हो उसे मैं पा लेना चाहता हूँ ताकि मुझे वह स्वाद दोबारा मिल सके| अगर मैं ध्यान से देखूं तो मुझे यह दिखता है की मेरे सारे क्रियाकलाप स्वाद पाने के लिए ही हो रहे हैं| मैं किसी भी वस्तु से, पिजा खा के, टीवी देख कर, घूम फिर के, गाने सुन के, लोगों के साथ समय बिता कर तथा कई अन्य क्रियाकलाप कर के स्वाद पाने की आशा रखता हूँ तथा वह स्वाद पा कर उसे निरंतर बनाये रखने की आशा लगता हूँ| पर ऐसा भी देखने मैं आता है की उनमें से किसी भी वस्तु से मुझे स्वाद की निरंतरता नहीं मिलती| जब किसी वस्तु से मिलने वाले स्वाद की निरंतरता भंग होने लगती है तो मैं किसी दूसरी वस्तु से स्वाद पाने की आशा लगाता हूँ| जैसे पिजा का स्वाद, जैसे जैसे मेरा पेट भरने लगता है पिजा का स्वाद कम होने लगता है, फिर मैं किसी दूसरे तरह के स्वाद की आशा लगाता हूँ, फिर मैं गाने सुनने लगाता हूँ या कुछ और करने लगता हूँ| गाने सुनने में या कुछ और करने में भी में कुछ ही समय में बोर हो जाता हूँ फिर मुझे किसी और स्रोत से स्वाद की इच्छा उठती है|
इस प्रयोग तथा विश्लेषण ने मेरे मन में और भी काफ़ी सारे सवाल खड़े कर दिए, आखिर यह सब हो क्या रहा है? यह सब अपने आप ही कैसे हो रहा है? मेरा मन उसी तरह से क्यों भाग रहा है जैसे की वह भगा और किसी तरह से क्यों नहीं? आखिर ये सब क्यों हो रहा है? इत्यादी| थोड़ा अनुसंधान करने पर तथा अन्य कुछ और लोगों से बात करने पर मैंने पाया की मेरा मन उन्ही जगहों पर भागता है जिनको मैंने महत्त्वपूर्ण मान रखा होता है| जहाँ पर मुझे स्वाद मिलने की आशा होती है, वहीं मेरा मन भागता है, उन्ही को मैं महत्त्वपूर्ण मनाता हूँ| जिन चीजों को मैं महत्त्वपूर्ण मानता हूँ, जिन चीजों से मैं प्रभावित होता हूँ, मेरा मन उन्ही चीजों की उधेड़बुन मैं लगा रहता है| मेरे मन मैं जितने भी विचार, जितनी भी इच्छाएं उठती हैं वे सब इसी आधार पर काम कर रही होती हैं| मेरी सारी इच्छा, विचार, आशाएं इसी आधार पर काम कर रही हैं, ऐसा देखने मैं आता है|
यहाँ पर दूसरा प्रश्न जो खड़ा होता है वह यह है की मैंने कुछ विशेष चीजों को महत्त्वपूर्ण तथा कुछ अन्य चीजों को अमहत्वपूर्ण क्यों मान रखा है? आश्चर्य की बात तो यह है की कुछ चीजों को महत्त्वपूर्ण मानना, कुछ चीजों को अमहत्वपूर्ण मानना, ये सब मैंने किया और मुझे पता ही नहीं है की मैं यह सब कर भी रहा हूँ| मेरा मन अपने आप उन सभी विषय वस्तुओं की तरफ़ भाग रहा है जिन्हें मैं महत्त्वपूर्ण मान रहा हूँ और मुझे ख़ुद को ही यह पता नहीं रहता की मैंने उन वस्तुओं को महत्त्वपूर्ण मान रखा है| स्वप्न मैं भी ऐसा ही होता है| मुझे स्वप्न मैं भी वही सब वस्तुएं दिखाई देती हैं जिनके बारे में मैं अक्सर विचार किया करता हूँ या कुछ हद तक महत्त्वपूर्ण मानता हूँ| जब मैंने अपने मन को उन विषय वस्तुओं की तरफ़ भागता हुआ देखा तब मेरा ध्यान गया की मैंने उन वस्तुओं को अपने जीवन मैं निश्चय ही एक उच्च स्थान दिया हुआ है|
यहाँ तक यह तो देखने मैं आ गया की मैं कुछ वस्तुओं को महत्त्वपूर्ण तथा अन्य को अमहत्वपूर्व मान रहा हूँ, पर मेरे अन्दर ऐसा क्यों हो रहा है, इसका विश्लेषण अभी बाकी है| मैंने ऐसा पाया की सुख की आशा मुझ मैं निरंतर बनी रहती है| मैं निरंतर सुखपूर्वक जीना चाहता हूँ| हर क्षण सुख चाहता हूँ| सुखी होने और सुखी होकर जीने की चाहना मुझ में नित्य वर्तमान है| इस चाहनावश मैं कई वस्तुओं में सुख ढूँढने का प्रयास करता हूँ| जिन वस्तुओं से मुझे सुख की आशा रहती है उन वस्तुओं को मैं महत्त्वपूर्ण मानता हूँ, तथा जिन चीजों से मुझे दुःख पहुच रहा होता है उन चीजों से छुटकारा पाने के नए नए तरीके मैं सोचता रहता हूँ| जब तक मैं अपने किसी विशेष दुःख के कारण को ढूँढ नहीं लेता और उससे छुटकारा नहीं पा लेता मैं उसे भूल नहीं पाता, मेरा मन उसी मैं लगा रहता है, उससे छुटकारा पा लेना चाहता है| यह देख कर भी ये प्रमाणित होता है की सुखपूर्वक जीने की चाहना मुझे मैं निरंतर बनी हुई है, जब मैं सुखी होता हूँ तो मैं उसी स्थिति मैं निरंतर रहना चाहता हूँ, और जब मैं दुखी होता हूँ तो मैं उस स्थिति से बाहर निकल जाना चाहता हूँ, और वापस से सुखी हो जाना चाहता हूँ| चाहना तो हमेशा मेरी सुख की ही है| मेरे सारे क्रियाकलाप, सारी इच्छाएं, विचार, आशाएं इसी एक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कार्यरत हैं| इस निरंतर सुखपूर्वक जीने की आशा को पूरा करने के लिए मुझे किसी ऐसी वस्तु की आवश्यकता है जिसमें निरंतर सुख का स्वभाव हो| सही समझ तथा संबंध का भाव ऐसी दो वस्तुएं बताई जाती हैं जिनसे निरंतर सुख मिलने की संभावना है|
good post ! raises a lot of questions. I sincerely feel that it should have a sequel . This post is incompletre in itself.
P.S Would read it again and think abt it more
Good work Debu Maharaj… thoda bandio ke baarein mein bhi likh do isme… aur interesting ban jaayega [:P]
You are quite a creative writer! The first para was refreshingly originative. For the rest of the content, we have already had several not-so-fruitful discussions
. I know that we all can relate to the perpetual happiness part. But the means you have proposed to get there are hazy and a bit too abstract for me. Good work, anyhow.
hi Devansh,
Its really a good one. I would like to read further analysis which you have kept pending. Keep posting and keep informed.
The mind is engrossed in analyzing things which are important to it, as you pointed out….we think, we dream of those things which matter to our mind, things which may be good or bad…and this criteria of defining good or bad is done by the mind itself. Nevertheless, it is in our control to check the flow of thoughts in our mind.By exercising power over my mind I can filter my thoughts. Never an easy task, require to much meditation and observation and retrospection of thoughts.
Everything, our behaviour,attitude,looks,…is governed by mind. And if one is capable enough to govern his mind,he reigns the world with his wisdom.
That is what I think and aspire to achieve. It was good to know the revelations of your mind.
Bhery Bhery good post Dev. Nice insight on how we live for most of the time at the level of “self” without even being aware of it. It has been difficult for me to see that I am a unit different from the body. This one turned out to be a bit helpful in trying to realize that. Thanx Dev. Keep it up!