श्रेष्ठता और विशेषता …

हमारे ज्यादातर प्रयास विशेष होने के लिए ही रहते हैं| हम कुछ ना कुछ विशेषता की चादर ओढे रहना चाहते हैं| विशेषता से मेरा तात्पर्य है “मैं बाकी लोगों से कुछ अलग हूँ, मूल्यवान हूँ”, स्वयं में यह भाव| बाकी लोगों से अलग होने पर मैं स्वयं मे अच्छा महसूस करता हूँ| उस विशेषता के आधार पर मैं अपनी पहचान बनाता हूँ| जैसे अगर मैं शारीरिक रूप से सुंदर हूँ तो मैं सुन्दरता के आधार पर स्वयं को पहचानता हूँ| मुझे लगता है कि मेरे पास एक ऐसी चीज़ है जिसके कारण बाकी लोग मुझ पर ध्यान देंगे, मुझे अच्छा देखेंगे, मुझसे जुड़ना चाहेंगे| इसी विशेषता के आधार पर मैं स्वयं के मूल्य को पहचानता हूँ| अगर हम सभी अपने आप को देखें तो यह देखने में आता है कि हम सभी किसी ना किसी विशेषता की चादर ओढे ही रहते हैं| उस चादर के उघड जाने पर हम स्वयं को नग्न महसूस करते हैं और हमें लगने लगता है कि हमारे आसपास के सभी लोग हमारी नग्नावस्था को देख कर हम पर अट्टहास कर रहे हैं| कई बार तो ऐसा भी होता है कि अगर हमें इस बात का अनुमान पहले ही लग जाए कि हमारी विशेषता की चादर उघड जाने वाली है तो हम उस भय के मारे आत्महत्या तक के लिए उतारू हो जाते हैं, जैसे एक्साम मे फ़ैल हो जाने के भय से या सोसायटी मैं नाक कट जाने के भय से आत्म हत्या कर लेना| इतना महत्व रखती है यह विशेषता की चादर|

अगर हम थोड़ा और ध्यान से देखें तो यह दीखता है कि हम कई सारी विशेषताओं कि चादरें ओढे रहते हैं| जैसे मैं सुंदर हूँ, मैं ऊंचे पर विराजमान हूँ, मैं धनवान, मैं बलवान हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ, मैं कई सारे लोगों के द्वारा जाना जाता हूँ, मझे लोग अच्छा देखते हैं, मैं बातें काफ़ी अच्छी कर लेता हूँ, इत्यादि| जितनी ज्यादा चादरें हम ओढे रहते हैं, हमारा आत्मविश्वास उतना ही अधिक बढ जाता है| हम स्वयं में उतना ही अधिक अच्छा महसूस करते हैं| किसी चादर के उघड जाने पर हम बाकी चादरों का सहारा लेकर अपने आत्मविश्वास को बनाये रखते हैं, परन्तु कुछ समय के लिए तो हमारा आत्मविश्वास किसी भी चादर के उघड जाने पर हिल ही जाता है| किसी भी चादर के उघड जाने पर हम दुखी तो होते ही हैं|

कई बार ऐसा भी होता है कि किसी विशेषता कि चादर को हमने बहुत ही लंबे समय से ओढ़ रखा हो तो हमारी उस चादर के प्रति आसक्ति बहुत ही प्रबल हो जाती है| ऐसे में अगर वो विशेषता की चादर हमसे अलग हो जाए या किसी भी कारण से उघड जाए तो हमें लगता है कि हम मिटटी में ही मिल गए| हमें लगने लगता है की हमारी कोई वेल्यु ही नहीं रह गई| यह स्थिति वही नग्न हो जाने जैसी होती है जिसमें हमें लगने लगता है कि बाकी सब हमारे आसपास के लोग हमें ही देख रहे हैं, हम पर अट्टहास कर रहे हैं| बाकी सब लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे यह तथ्य हमें बहुत प्रताडित करने लगता है| ऐसे में अगर हमें किसी और विशेषता की चादर का सहारा मिल जाए तो वह हमें बहुत ही आराम दे देती है| यहाँ तक की किसी अकेले आदमी का सहारा भी ऐसे समय पर बहुत ही मूल्यवान मालूम होता है| जैसे एक्साम में अच्छे नंबर ना आने पर बच्चे को बोलना कि तुम्हें विषय तो आता ही है नंबर नहीं आए तो क्या हो गया| एक चादर उघड जाने पर हम किसी और चादर का सहारा ले लेते हैं|

अगर हम ध्यान से देखें तो यही समझ में आता है कि विशेषता कि चादर ओढ़ने के मूल में स्वयं के मूल्यवान होने जाने या माने जाने की आशा है| यहाँ पर यही देखने में आता है कि किसी विशेषता कि चादर ओढ़ने पर हमें जो स्वयं में मूल्यवान होने का जो भाव महसूस होता है उसके मूल में उस विशेषता के साथ में हमारे जुड़ जाने पर दूसरों के नज़रिए का हमारे प्रति अच्छा हो जाने का जो हमने अनुमान लगाया रहता है, वही है| जैसे, “अगर मैं धनवान हो गया तो लोगों का नजरिया मेरे प्रति अच्छा होगा, लोग मुझे अच्छा और ऊंचा देखेंगे”|

यहाँ पर एक और जो चीज़ देखने मैं आती है वह यह है कि विशेषता से मिलने वाले सुख या विश्वास कि निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता नहीं बन पाती| इसके मूल मे कारण यही है कि हम किसी विशेषता से जुड़ने के लिए तभी प्रेरित होते हैं जब हमें उससे जुड़ कर अपने मूल्य में वृद्धि का अनुमान हो| मूल्य में वृद्धि का आधार लोगों में उस विशेषता के प्रति प्रचलित मान्यता रहता है| जैसे सोना| अगर सोना आजकल प्रचलित है और सोने के गहने पहनने वालों को ऊंची नज़रों से देखा जाता है तो ज्यादा से ज्यादा लोग सोने के गहने बनवाने और पहनने के लिए प्रेरित होते हैं| उससे उन्हें स्वयं में सुख, विश्वास का अनुभव होता है| पर उस सुख, विश्वास के निरंतर बने रहने के लिए निम्न शर्तें पूरी होना जरूरी होगा:-
१. सोने के उस विशेष प्रकार के गहने के प्रति जो हमने पहना हुआ है, लोगों का नज़रिया बरक़रार रहे और वे मुझे वह ज़ाहिर करते रहे|
२.  उनके नज़रिए के बने रहने से मुझे जो आनंद प्राप्त हो रहा है उसकी मुझ में स्थिरता, निरंतरता बनी रहे|

अगर हम ध्यान से देखें तो ये दोनों ही शर्तें पूरी नहीं हो पाती| जैसे ही कोई व्यक्ति मुझसे अच्छा गहना पहन कर उनके सामने आता है वे उसे ज्यादा अच्छा देखने लगते हैं और मेरी वेल्यु उनकी नज़रों में कम हो जाती है| या फिर अगर मार्केट में सोने की ही वेल्यु कम हो जाए क्यूंकि उससे अच्छा कोई और धातु मार्केट में आ गया है तो भी मेरी वेल्यु घट जाती है| और भी कई सारी चीज़ें हो सकती हैं जो लोगों का मेरे गहने के प्रति नज़रिए को पहले से कम अच्छा कर दें| यहाँ पर यही देखने में आता है कि लोगों का नज़रिया या किसी वस्तु के प्रति उनकी मान्यता की स्थिरता, निरंतरता नहीं बनी रहती|

दूसरी चीज़ जो देखने में आती है वह यह है कि किसी वस्तु के प्रति हमारी ख़ुद की मान्यता भी स्थिर नहीं बनी रहती| अगर हमारे आस पास के लोग रोज रोज भी हमारे घर आ कर हमारे गहने की तारीफ करते भी रहे तो भी हम थोड़े दिनों बाद उस तारीफ से उतना आनंद प्राप्त नहीं कर पते, जितना की हम पहले कर रहे थे| हमें अब इस बात की आवश्यकता महसूस होती है की लोग हमारी थोडी और ज्यादा तारीफ करें, नए तरीके से तारीफ करें, हमारे ऊपर नए तरीके से ध्यान दें| फिर थोड़े दिनों बाद हम उनके उस नए तरीके से भी बोर होने लगते हैं|

यहाँ पर यह सिद्ध हो जाता है कि विशेषता से मिलने वाले सुख/विश्वास कि निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता नहीं है| जबकि मनुष्य सुख, विश्वास की स्वयं में निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता चाहता है|

परन्तु किसी विशेषता की चादर के बिना हम में हमारे मूल्य के प्रति सजगता के आभाव में हम किसी न किसी विशेषता की चादर को निरंतर ओढे रखना चाहते हैं| और तो और क्यूंकि उससे मिलने वाले सुख, विश्वास की निरंतरता नहीं बनी रहती इसलिए हम भी निरंतर और नई नई चादरें ओढ़ने के लिए प्रेरित होते रहते हैं| एक चादर की मान्यता कम हो जाने पर हम उसमें कुछ और डिजाईन बनवाने की कोशिश करते हैं, उस पर नया रंग चढवा लेते हैं या पूरी की पूरी चादर ही बदल डालते हैं| अपने मूल्य को बनाये रखने के लिए या उसे और अधिक बड़ा लेने के लिए ऐसा कर लेना एक आवश्यकता के रूप में बना रहता है जिसका कोई और विकल्प दिखाई भी नहीं देता| अगर हम स्वयं में अपने विश्वास के भाव को ध्यान से देखें तो यह साफ़ दीखता है की वह किस तरह एक वस्तु से दूसरी वस्तु की तरफ़ भागता रहता है| किस तरह नए नए तरीके से वह अपने आप को सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है| यही सिद्ध करता है उस विश्वास के भाव या सुख की निरंतर आवश्यकता को|

यहाँ पर इतना तो बहुत ही आराम से देखने में आता है कि विशेषता से मिलने वाले सुख, विश्वास के निरंतर ना होने पर हमें जो उसको निरंतर बनाये रखने के लिए कार्य करना पड़ता है वह अपने आप में ही बहुत दुखदायी है| जबकि हर इंसान निरंतर सुख की प्रत्याशा रखता है| यहाँ पर आकर हमें स्वयं में सुख, विश्वास की निरंतर आवश्यकता का आभास तथा उसको निरंतर सुनिश्चित करने के लिए समाधान की आवश्यकता महसूस होती है| यहाँ पर यही समझ में आता है कि स्वयं में स्वयं के निरपेक्ष मूल्य के ज्ञान के आभाव में ही हम किसी ना किसी विशेषता के आधार पर स्वयं के मूल्य को पहचानने का प्रयास करते हैं, जो कि विफल होता रहता है| स्वयं में स्वयं के मूल्य के प्रति निर्भ्रमता या ज्ञान हे लिए प्रयास ही श्रेष्ठता के लिए प्रयास है तथा स्वयं में उस ज्ञान का होना ही श्रेष्ठता है|

इस पूरे विश्लेषण से यही सिद्ध हो जाता है कि स्वयं में स्वयं तथा अस्तित्व के प्रति ज्ञान का आभाव ही स्वयं में दुखों का कारण है| स्वयं में स्वयं का ज्ञान ही पूर्ण समाधान, सुख तथा विश्वास का एक निश्चित आधार है| यही श्रेष्ठता है|

Published in:  on February 20, 2009 at 11:39 am Leave a Comment

Parents …

The base of Parent’s acceptance for their children is Unconditional.

A small baby has newly joined the family. Parents are very happy. They have been waiting for this moment since a long time. They already have many desires, thoughts and hopes associated with this child. This child has brought new dimension of happiness to parents. Child’s innocent face, closed eyes, small hands and legs become source of ultimate happiness for them. Daily many people come to house to see small baby, parents feel very happy showing the child.

They spend their whole time and energy thinking and taking care of the baby. He wakes up any time in the night and starts crying, parents also get up and take care of him. They do not sleep until he sleeps, they get up as soon as he gets up. They attend him as soon as he starts crying because of any reason. Now they have reduced going outside much since they have to take care of child. It gives them more happiness than enjoying something outside. Even on holidays playing with child is the major activity they are involved in. His every new activity gives them extreme joy. If he speaks anything new it makes them really happy. His gestures, his actions, the way he makes his face on various situations, the way he reacts to various situations and everything he does makes them really happy.

He starts going to school and a new schedule is introduced for parents also. They get up early, wake him up, prepare breakfast for him, dress him for school, drop him to school or to the bus stop and then they get back to their work. When he comes back from school attend him, help him in his homework, understand his problems and spend time with him. This keeps happening in his entire schooling.

When he comes to a higher standard parents start thinking about his career. What they want him to become, what he is liking etc. If it is required to send him outside home to some distant place for studies they are ready for it for the sake of a good career of their child. It is really painful for them but they do that. Even after sending him away they keep taking care of him completely. They call him, they try to understand his problems, they are even ready to come to the place of child and spend as much time with him as he wants.

As child grows, he sometimes even contradicts, behaves badly with his parents. They bear it. Even if they get angry the acceptance is restored within no time. Base of their acceptance is unconditional. Kid’s goals become their goals, kids aspirations become their aspirations. Even if their is a conflict between the aspiratins of kid and parents dreams for kid, they try to make him understand various pros and cons of various things and if he doesn’t understand they ultimately succumb to him, while maintaining their acceptance. It might take some time but acceptance is restored again.

I have been appreciating this aspect of parents children relationships since a long time and thought of writing this post. It really amazes me when I see the beauty of this relationship. I remember many incidents in my own life as well as many many cases with others too, related to this unconditional aspect of parent children relationships.

Published in:  on at 11:38 am Leave a Comment

Don’t Judge Me!

Generally we do not like to be judged by others. When somebody judges us and that also wrongly then it hurts us,  especially people whom we consider important or whom we consider close to us or like.

We see that we interact with several people, we talk to several people. Sometimes it so happens that other person behaves with us in a strange way or says something with which we feel that we are being wrongly evaluated or our intention is under doubt or something bad is being thought about us, then this thing makes us unhappy. We want other person to think about us right or good again. We want him to rightly evaluate us again. We even sometimes get away from that person, but this thing keeps pricking us within ourselves that we are being wrongly evaluated by other person. When we confront that person we become self-concious. Again that thought of being wrongly evaluated comes into our mind. Our heart beat frequency increases. If we realize that other person is doing that or did that intentionally then we get angry. We want to teach a lesson to other person.

We see that all these things keep happening, but the question remains, why is it happening?

A human being wants Unconditional Acceptance from other person. We expect other person to never doubt our intentions, we want him to rightly evaluate us always. When this thing happens we feel good. When this does not happen we feel bad. This expectation of unconditional acceptance can be easily observed in our close relatives, people whom we consider close to us, people whom we like. Even a slight behavior change in them gives rise to 1000s of questions within us. We always want at least one person with whom we have assurance that he is there for me no matter what, he will be there for me no matter what.

We see that this expectation is there. When this expectation is fulfilled a human being feels really happy. When it is not getting fulfilled he is in search of somebody who can fulfill it. When we feel that from a person with whom this expectation was getting fulfilled since a long time, now it is not getting fulfilled then, we get really hurt. We want other person to accept us again the same way on any cost.

This expectation of Unconditional Acceptance is always present within us. It is Ever Actively Present. It is not something which is optional. It is not something which can be suppressed. It is there. We can only identify the root cause behind it and just can serve this expectation the right way. There is no way out of it.

Unconditional Acceptance means, Unconditional Trust and Unconditional Respect.

We feel that we are being Trusted Unconditionally when we have assurance that other person Trusts our intention. Other person doesn’t doubt our intention and will never doubt our intention.

We feel that we are being Respected Unconditionally when we have assurance that other person Evaluates us Rightly and will keep on Evaluating us Rightly.

A human being from birth has this expectation of Unconditional Acceptance from others but lacks the competence to give it to the others. This is the root cause of all the human problems.

A human being can become competent to accept others Unconditionally only when he has Knowledge. With Knowledge one’s expectation for Unconditional Acceptance from others is also fulfilled and one is also able to accept others Unconditionally.

To understand Trust, Respect, Happiness etc. we need Knowledge.

Knowledge includes, complete understanding related to,
Self,
Family,
Society,
Nature.

Published in:  on at 11:38 am Leave a Comment

मैं सही हूँ, मैं अच्छा हूँ …

हर व्यक्ति स्वयं में इसी विश्वास के साथ जीना चाहता है कि, “मैं सही हूँ, मैं अच्छा हूँ”| यह विश्वास का भाव मनुष्य की मूल आवश्यकता है| यह एक ऐसी आवश्यकता है जो उसमें निरंतर बनी रहती है| जब भी उसे किसी भी कारण से ऐसा लगता है कि मैं अच्छा नहीं हूँ, मैं सही नहीं हूँ तो वह परेशान हो जाता है और जब उसमें यह विश्वास बना रहता है तो वह खुश रहता है| स्वयं मे इस विश्वास के भाव की आवश्यकता मनुष्य की भोजन की आवश्यकता से बिल्कुल अलग है| भोजन तो मनुष्य को दिन मे ३ वक्त चाहिए होता है, पर इस विश्वास के भाव की आवश्यकता मनुष्य मे निरंतर, नित्य, समान तीव्रता से बनी रहती है| बल्कि ऐसा भी देखने में आता है कि अगर ये विश्वास के भाव की मुझ में कमी हो तो मुझे भोजन भी अच्छा नहीं लगता| कितना भी स्वादिष्ट भोजन मेरे समक्ष रखा हो मुझे नीरस लगने लगता है| मेरा सारा ध्यान उस विश्वास के भाव को दोबारा सुनिश्चित करने की तरफ़ लगा रहता है|

अक्सर ऐसा देखने में आता है कि हमारे अन्दर इस विश्वास का आधार कि “मैं सही हूँ, मैं अच्छा हूँ”, दूसरे व्यक्ति का हमारे प्रति नज़रिया, बना रहता है| जब दूसरे व्यक्ति का नज़रिया हमारे प्रति अच्छा होता है तो हमें स्वयं में इस विश्वास का अनुभव होता है कि “हम सही हैं, हम अच्छे हैं” और जब उसका नज़रिया हमारे प्रति अच्छा नहीं होता तो हम स्वयं में अच्छा महसूस नहीं करते और परेशान हो जाते हैं| अक्सर ऐसा भी होता है कि जब हमें लगता है कि दूसरे व्यक्ति का नज़रिया हमारे प्रति अच्छा नहीं है या दूसरा व्यक्ति हमारे बारे में अच्छा नहीं सोचता तब भी हम परेशान हो जाते हैं| इसमें ऐसा भी हो सकता है कि दूसरा व्यक्ति तो हमारे बारे में अच्छा सोचता हो पर हमें लग रहा हो कि कुछ गड़बड़ है| जैसा कि पहले ही हम देख चुके हैं कि यह विश्वास की आवश्यकता तो निरंतर बनी ही रहती है, तो इस तरह की परिस्थिति में अपने विश्वास को दोबारा से पाने के लिए हम कई तरह के काम करने कि कोशिश करते हैं, जैसे दूसरे व्यक्ति से दूर हो जाना, दूसरे व्यक्ति के प्रति मेरे भाव में कमी आ जाना, दूसरे व्यक्ति से बात कर के मामले को सुलझा लेने की कोशिश करना, दूसरे व्यक्ति से बात करने की कोशिश करना और यह सुनिश्चित करना कि सब पहले जैसा हो जाए, दूसरे व्यक्ति को अपनी नज़रों में ही नीचे गिरा देना ताकि उसके मेरे प्रति नज़रिए का कोई महत्व ही नहीं रह जाए, दूसरे व्यक्ति को मजा चखाने कि कोशिश करना ताकि मेरा विश्वास तो बढ ही जाए और दूसरा व्यक्ति उसकी ख़ुद कि नज़रों में भी नीचे गिर जाए और परेशान हो, और तो और कई बार हम दूसरे व्यक्ति को शारीरिक, आर्थिक, मानसिक रूप से भी नुक्सान पहुचाने की कोशिश करते हैं| इतना सब कुछ करते हैं हम अपने इस विश्वास कि आवश्यकता को पूरा करने और बनाये रखने के लिए और हमें पता भी नहीं चलता|

अगर हम ध्यान से देखें तो यह देखने में आता है कि इस विश्वास के भाव को सुनिश्चित करने के लिए ही हमारे अधिकतम कार्य व्यवहार हो रहे हैं| परीक्षा में अच्छे नंबर लाने का प्रयास, अधिक से अधिक धन कमाने का प्रयास, ऊंचे पद को पा लेने का प्रयास, दूसरों कि नज़रों में ऊपर उठने का प्रयास, किसी संस्था से जुड़ जाने का प्रयास, किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के सान्निध्य को पा लेने का प्रयास, दूसरे व्यक्ति को मजा चखाने का प्रयास, तीर्थ यात्रा करना, किसी धर्मं से जुड़ जाना, बड़ी बड़ी डिग्रियां पाने का प्रयास, किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश जो हमें समझे, बहुत सारी किताबें पड़ के ज्ञानी बन जाने का प्रयास, दूसरों के समक्ष वैसे प्रस्तुत होना जैसे हम नहीं हैं, दूसरों से जीतने का प्रयास, प्रतियोगिताओं में प्रथम आने का प्रयास, किसी विदेशी व्यक्ति का सान्निध्य पाने का प्रयास, विदेश जाने का प्रयास, बहुत बड़ा घर बनाने का प्रयास, सुंदर साथी पाने का प्रयास, विशेष हो जाने का प्रयास इत्यादि, सभी में मूलतः तो स्वयं में विश्वास सुनिश्चित करने कि ही आशा है|

जिस भी वस्तु को हम जितना मूल्यवान मानते हैं उसे पाकर हम स्वयं में उतना ही विश्वास का अनुभव करते हैं|

जैसे अगर मैं किसी ऊंचे पद को बहुत महत्त्वपूर्ण मानता हूँ तो उसे पाकर मैं स्वयं मैं बहुत ही अच्छा महसूस करता हूँ, मेरे अन्दर यह भाव कि “मैं सही हूँ, मैं अच्छा हूँ” बहुत बलवती हो जाता है, मैं स्वयं मे विश्वास का अनुभव करता हूँ| उसी तरह से और भी बहुत सारे उदाहरण है जो पहले ही लिए जा चुके हैं|

यहाँ पर प्रश्न यह खड़ा होता है कि किसी भी वस्तु के मूल्य का निर्धारण मैं किस आधार पर करता हूँ? किस वस्तु को मैं अधिक मूल्यवान मानता हूँ और किसको कम?
यहाँ पर ऐसा देखने मे आता है कि, किसी भी वस्तु का मेरे लिए महत्व या मूल्य अक्सर तीन चीज़ों पर निर्भर करता है|
१. उस वस्तु के रंग, रूप, आकार, रस, सुगंध, स्पर्श आदि से मुझे मिलने वाले सुख के आधार पर|
२. मेरे उस वस्तु के साथ मे जुड़ जाने पर मैंने अपने मूल्य/महत्व मे जिस वृद्धि का अनुमान लगाया रहता है, उसके आधार पर|
३. उपरोक्त दोनों बिन्दुओं के साथ में होने पर| उनके सम्मिलित प्रभाव के आधार पर|

जैसे सोना| सोना मुझे देखने में भी सुंदर लगता है और जब मैं उससे बने हुए गहने पहन कर लोगों के समक्ष प्रस्तुत होता हूँ तो वे मुझ पर ध्यान देते हैं, मेरी तारीफ करते हैं, मुझे स्वयं में यह महसूस होता है कि “मैं अच्छा हूँ” और यह भाव मेरे सुख में वृद्धि करता है| यह हमारे साथ हमारे जीने के हर आयाम में होता है| जब भी मैं स्वयं को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ में पाता हूँ जिसको मैं महत्त्वपूर्ण मानता हूँ तो मुझे अच्छा लगता है, मैं अपनी पहचान उस व्यक्ति के साथ जोड़ कर बनाने लगता हूँ, मुझे स्वयं मैं भी “महत्त्वपूर्ण” महसूस होता है जो मेरे सुख का कारण बनता है| यहाँ पर उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं कि किसी बड़े नेता या फ़िल्म अभिनेता, अभिनेत्री आदि के साथ फोटो खिंचवाना, उनके दस्तखत लेना इत्यादि|  लड़के लड़कियों के एक दूसरे के प्रति आकर्षित होने में भी यही तथ्य है|

यहाँ पर यह भी देखने मे आता है कि उपरोक्त बताये गए पहले २ बिन्दुओं मे से दूसरा बिन्दु प्रधान है| अगर किसी वस्तु से मेरे महत्व मे वृद्धि हो रही हो तो उस वस्तु से जुड़े दूसरे पक्ष मेरे लिए स्थूल हो जाते हैं| जैसे कई लोग शराब इसलिए पीते हैं क्योकि  उन्हें लगता है शराब पीने से उन्हें ऊँची सोसायटी का माना जायेगा, उन्हें ऊंचा देखा जायेगा| इसके कारण वे शराब के कड़वे स्वाद में भी आनंद ले लेते हैं| शराब का कड़वा स्वाद भी उन्हें रस देने लगता है| अभी कुछ ही दिनों पहले मैंने टी वी पर देखा कि किसी जंगल के कबीले के लोग अपने पूरे शरीर को ब्लेड से जगह जगह से खंरोचते हैं और इस प्रक्रिया में उनका पूरा शरीर खून से लत्पत हो जाता है, पर फिर भी वे यह करते हैं क्योकि उनके कबीले में इस क्रिया को बहुत ही बड़ी पध्वी प्राप्त है| इसे वे लोग बहुत ही ऊंची चीज़ मानते हैं| यहाँ पर भी यही देखने में आता है कि भाव पक्ष को सुनिश्चित करने के लिए इंसान किसी भी हद तक आमादा हो सकता है| “में सही हूँ, मैं अच्छा हूँ” इस भाव को सुनिश्चित करने के लिए ही सह सब हो रहा है|

यहाँ पर यह भी देखने में आता है कि हम जितने भी तरीके इस्तेमाल करते हैं इस भाव को सुनिश्चित करने के लिए उनमें से किसी भी तरीके से उस भाव कि निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता सुनिश्चित नहीं हो पाती| जबकि इंसान को उस भाव कि निरंतरता चाहिए| यहाँ पर यह जानना अंत्यंत ही जरूरी हो जाता है कि इस भाव कि निरंतरता की चाहना के मूल में क्या है? यह चाहना क्यूँ है? इस चाहना का प्रयोजन क्या है? यहाँ पर यही समझ में आता है की मानव को सुखी होकर के जीने के लिए लिए ज्ञान चाहिए| ज्ञान का अर्थ है स्वयं में स्वयं तथा अस्तित्व का ज्ञान| स्वयं में स्वयं के ज्ञान के अभाव में हम स्वयं को उस तरह से पहचानते हैं जिस तरह से हमें अन्य लोग देखते हैं| हम अपनी पहचान विभिन्न वस्तुओं के आधार पर बना लेते हैं, जैसे रूप, धन, पद, बल, बुद्धि आदि| हमारी जिस वस्तु के प्रति जैसी मान्यता रहती है उस वस्तु से जुड़ कर हम वैसा ही महसूस करते हैं| हमारी उस वस्तु के प्रति जो मान्यता है उसका आधार भी अन्य लोगों में प्रचलित मान्यता ही रहता है| उस तरह की मान्यता में स्थिरता, निरंतरता नहीं रहती| जैसे ऊंचे पद पर विराजमान हो जाने पर भी मुझे अन्य लोग नित्य सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते रहते और अगर देख भी रहे हों तो भी मुझे निरंतर तृप्ति नहीं मिल पाती, मुझे निरंतर उन लोगों का ध्यान पाने के लिए कुछ न कुछ परिवर्तन लाने की आवश्यकता महसूस होती है और अगर उस पद की लोगों में पहचान ही कम हो जाए, वे उसको पहले से कम महत्व देने लगें तो में स्वयं को कम महत्त्वपूर्ण महसूस करने लगता हूँ, मेरा विश्वास डगमगा जाता है|  यहाँ पर से यह सिद्ध हो जाता है कि स्वयं में विश्वास ही स्वयं में सुख है और मनुष्य को उस विश्वास कि नित्य आवश्यकता है| यह आवश्यकता ज्ञान से ही पूरी हो सकती है|

Published in:  on at 11:37 am Leave a Comment