हर व्यक्ति स्वयं में इसी विश्वास के साथ जीना चाहता है कि, “मैं सही हूँ, मैं अच्छा हूँ”| यह विश्वास का भाव मनुष्य की मूल आवश्यकता है| यह एक ऐसी आवश्यकता है जो उसमें निरंतर बनी रहती है| जब भी उसे किसी भी कारण से ऐसा लगता है कि मैं अच्छा नहीं हूँ, मैं सही नहीं हूँ तो वह परेशान हो जाता है और जब उसमें यह विश्वास बना रहता है तो वह खुश रहता है| स्वयं मे इस विश्वास के भाव की आवश्यकता मनुष्य की भोजन की आवश्यकता से बिल्कुल अलग है| भोजन तो मनुष्य को दिन मे ३ वक्त चाहिए होता है, पर इस विश्वास के भाव की आवश्यकता मनुष्य मे निरंतर, नित्य, समान तीव्रता से बनी रहती है| बल्कि ऐसा भी देखने में आता है कि अगर ये विश्वास के भाव की मुझ में कमी हो तो मुझे भोजन भी अच्छा नहीं लगता| कितना भी स्वादिष्ट भोजन मेरे समक्ष रखा हो मुझे नीरस लगने लगता है| मेरा सारा ध्यान उस विश्वास के भाव को दोबारा सुनिश्चित करने की तरफ़ लगा रहता है|
अक्सर ऐसा देखने में आता है कि हमारे अन्दर इस विश्वास का आधार कि “मैं सही हूँ, मैं अच्छा हूँ”, दूसरे व्यक्ति का हमारे प्रति नज़रिया, बना रहता है| जब दूसरे व्यक्ति का नज़रिया हमारे प्रति अच्छा होता है तो हमें स्वयं में इस विश्वास का अनुभव होता है कि “हम सही हैं, हम अच्छे हैं” और जब उसका नज़रिया हमारे प्रति अच्छा नहीं होता तो हम स्वयं में अच्छा महसूस नहीं करते और परेशान हो जाते हैं| अक्सर ऐसा भी होता है कि जब हमें लगता है कि दूसरे व्यक्ति का नज़रिया हमारे प्रति अच्छा नहीं है या दूसरा व्यक्ति हमारे बारे में अच्छा नहीं सोचता तब भी हम परेशान हो जाते हैं| इसमें ऐसा भी हो सकता है कि दूसरा व्यक्ति तो हमारे बारे में अच्छा सोचता हो पर हमें लग रहा हो कि कुछ गड़बड़ है| जैसा कि पहले ही हम देख चुके हैं कि यह विश्वास की आवश्यकता तो निरंतर बनी ही रहती है, तो इस तरह की परिस्थिति में अपने विश्वास को दोबारा से पाने के लिए हम कई तरह के काम करने कि कोशिश करते हैं, जैसे दूसरे व्यक्ति से दूर हो जाना, दूसरे व्यक्ति के प्रति मेरे भाव में कमी आ जाना, दूसरे व्यक्ति से बात कर के मामले को सुलझा लेने की कोशिश करना, दूसरे व्यक्ति से बात करने की कोशिश करना और यह सुनिश्चित करना कि सब पहले जैसा हो जाए, दूसरे व्यक्ति को अपनी नज़रों में ही नीचे गिरा देना ताकि उसके मेरे प्रति नज़रिए का कोई महत्व ही नहीं रह जाए, दूसरे व्यक्ति को मजा चखाने कि कोशिश करना ताकि मेरा विश्वास तो बढ ही जाए और दूसरा व्यक्ति उसकी ख़ुद कि नज़रों में भी नीचे गिर जाए और परेशान हो, और तो और कई बार हम दूसरे व्यक्ति को शारीरिक, आर्थिक, मानसिक रूप से भी नुक्सान पहुचाने की कोशिश करते हैं| इतना सब कुछ करते हैं हम अपने इस विश्वास कि आवश्यकता को पूरा करने और बनाये रखने के लिए और हमें पता भी नहीं चलता|
अगर हम ध्यान से देखें तो यह देखने में आता है कि इस विश्वास के भाव को सुनिश्चित करने के लिए ही हमारे अधिकतम कार्य व्यवहार हो रहे हैं| परीक्षा में अच्छे नंबर लाने का प्रयास, अधिक से अधिक धन कमाने का प्रयास, ऊंचे पद को पा लेने का प्रयास, दूसरों कि नज़रों में ऊपर उठने का प्रयास, किसी संस्था से जुड़ जाने का प्रयास, किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के सान्निध्य को पा लेने का प्रयास, दूसरे व्यक्ति को मजा चखाने का प्रयास, तीर्थ यात्रा करना, किसी धर्मं से जुड़ जाना, बड़ी बड़ी डिग्रियां पाने का प्रयास, किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश जो हमें समझे, बहुत सारी किताबें पड़ के ज्ञानी बन जाने का प्रयास, दूसरों के समक्ष वैसे प्रस्तुत होना जैसे हम नहीं हैं, दूसरों से जीतने का प्रयास, प्रतियोगिताओं में प्रथम आने का प्रयास, किसी विदेशी व्यक्ति का सान्निध्य पाने का प्रयास, विदेश जाने का प्रयास, बहुत बड़ा घर बनाने का प्रयास, सुंदर साथी पाने का प्रयास, विशेष हो जाने का प्रयास इत्यादि, सभी में मूलतः तो स्वयं में विश्वास सुनिश्चित करने कि ही आशा है|
जिस भी वस्तु को हम जितना मूल्यवान मानते हैं उसे पाकर हम स्वयं में उतना ही विश्वास का अनुभव करते हैं|
जैसे अगर मैं किसी ऊंचे पद को बहुत महत्त्वपूर्ण मानता हूँ तो उसे पाकर मैं स्वयं मैं बहुत ही अच्छा महसूस करता हूँ, मेरे अन्दर यह भाव कि “मैं सही हूँ, मैं अच्छा हूँ” बहुत बलवती हो जाता है, मैं स्वयं मे विश्वास का अनुभव करता हूँ| उसी तरह से और भी बहुत सारे उदाहरण है जो पहले ही लिए जा चुके हैं|
यहाँ पर प्रश्न यह खड़ा होता है कि किसी भी वस्तु के मूल्य का निर्धारण मैं किस आधार पर करता हूँ? किस वस्तु को मैं अधिक मूल्यवान मानता हूँ और किसको कम?
यहाँ पर ऐसा देखने मे आता है कि, किसी भी वस्तु का मेरे लिए महत्व या मूल्य अक्सर तीन चीज़ों पर निर्भर करता है|
१. उस वस्तु के रंग, रूप, आकार, रस, सुगंध, स्पर्श आदि से मुझे मिलने वाले सुख के आधार पर|
२. मेरे उस वस्तु के साथ मे जुड़ जाने पर मैंने अपने मूल्य/महत्व मे जिस वृद्धि का अनुमान लगाया रहता है, उसके आधार पर|
३. उपरोक्त दोनों बिन्दुओं के साथ में होने पर| उनके सम्मिलित प्रभाव के आधार पर|
जैसे सोना| सोना मुझे देखने में भी सुंदर लगता है और जब मैं उससे बने हुए गहने पहन कर लोगों के समक्ष प्रस्तुत होता हूँ तो वे मुझ पर ध्यान देते हैं, मेरी तारीफ करते हैं, मुझे स्वयं में यह महसूस होता है कि “मैं अच्छा हूँ” और यह भाव मेरे सुख में वृद्धि करता है| यह हमारे साथ हमारे जीने के हर आयाम में होता है| जब भी मैं स्वयं को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ में पाता हूँ जिसको मैं महत्त्वपूर्ण मानता हूँ तो मुझे अच्छा लगता है, मैं अपनी पहचान उस व्यक्ति के साथ जोड़ कर बनाने लगता हूँ, मुझे स्वयं मैं भी “महत्त्वपूर्ण” महसूस होता है जो मेरे सुख का कारण बनता है| यहाँ पर उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं कि किसी बड़े नेता या फ़िल्म अभिनेता, अभिनेत्री आदि के साथ फोटो खिंचवाना, उनके दस्तखत लेना इत्यादि| लड़के लड़कियों के एक दूसरे के प्रति आकर्षित होने में भी यही तथ्य है|
यहाँ पर यह भी देखने मे आता है कि उपरोक्त बताये गए पहले २ बिन्दुओं मे से दूसरा बिन्दु प्रधान है| अगर किसी वस्तु से मेरे महत्व मे वृद्धि हो रही हो तो उस वस्तु से जुड़े दूसरे पक्ष मेरे लिए स्थूल हो जाते हैं| जैसे कई लोग शराब इसलिए पीते हैं क्योकि उन्हें लगता है शराब पीने से उन्हें ऊँची सोसायटी का माना जायेगा, उन्हें ऊंचा देखा जायेगा| इसके कारण वे शराब के कड़वे स्वाद में भी आनंद ले लेते हैं| शराब का कड़वा स्वाद भी उन्हें रस देने लगता है| अभी कुछ ही दिनों पहले मैंने टी वी पर देखा कि किसी जंगल के कबीले के लोग अपने पूरे शरीर को ब्लेड से जगह जगह से खंरोचते हैं और इस प्रक्रिया में उनका पूरा शरीर खून से लत्पत हो जाता है, पर फिर भी वे यह करते हैं क्योकि उनके कबीले में इस क्रिया को बहुत ही बड़ी पध्वी प्राप्त है| इसे वे लोग बहुत ही ऊंची चीज़ मानते हैं| यहाँ पर भी यही देखने में आता है कि भाव पक्ष को सुनिश्चित करने के लिए इंसान किसी भी हद तक आमादा हो सकता है| “में सही हूँ, मैं अच्छा हूँ” इस भाव को सुनिश्चित करने के लिए ही सह सब हो रहा है|
यहाँ पर यह भी देखने में आता है कि हम जितने भी तरीके इस्तेमाल करते हैं इस भाव को सुनिश्चित करने के लिए उनमें से किसी भी तरीके से उस भाव कि निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता सुनिश्चित नहीं हो पाती| जबकि इंसान को उस भाव कि निरंतरता चाहिए| यहाँ पर यह जानना अंत्यंत ही जरूरी हो जाता है कि इस भाव कि निरंतरता की चाहना के मूल में क्या है? यह चाहना क्यूँ है? इस चाहना का प्रयोजन क्या है? यहाँ पर यही समझ में आता है की मानव को सुखी होकर के जीने के लिए लिए ज्ञान चाहिए| ज्ञान का अर्थ है स्वयं में स्वयं तथा अस्तित्व का ज्ञान| स्वयं में स्वयं के ज्ञान के अभाव में हम स्वयं को उस तरह से पहचानते हैं जिस तरह से हमें अन्य लोग देखते हैं| हम अपनी पहचान विभिन्न वस्तुओं के आधार पर बना लेते हैं, जैसे रूप, धन, पद, बल, बुद्धि आदि| हमारी जिस वस्तु के प्रति जैसी मान्यता रहती है उस वस्तु से जुड़ कर हम वैसा ही महसूस करते हैं| हमारी उस वस्तु के प्रति जो मान्यता है उसका आधार भी अन्य लोगों में प्रचलित मान्यता ही रहता है| उस तरह की मान्यता में स्थिरता, निरंतरता नहीं रहती| जैसे ऊंचे पद पर विराजमान हो जाने पर भी मुझे अन्य लोग नित्य सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते रहते और अगर देख भी रहे हों तो भी मुझे निरंतर तृप्ति नहीं मिल पाती, मुझे निरंतर उन लोगों का ध्यान पाने के लिए कुछ न कुछ परिवर्तन लाने की आवश्यकता महसूस होती है और अगर उस पद की लोगों में पहचान ही कम हो जाए, वे उसको पहले से कम महत्व देने लगें तो में स्वयं को कम महत्त्वपूर्ण महसूस करने लगता हूँ, मेरा विश्वास डगमगा जाता है| यहाँ पर से यह सिद्ध हो जाता है कि स्वयं में विश्वास ही स्वयं में सुख है और मनुष्य को उस विश्वास कि नित्य आवश्यकता है| यह आवश्यकता ज्ञान से ही पूरी हो सकती है|