दुनियादारी और समझदारी

अभी के वक़्त में दुनियादारी का मतलब जो लगाया जाता है वह है, राजी काजी लोगों से अपने काम निकलवाने का हुनर| इसी को ये तथाकथित समझदार लोग समझदारी भी मानते हैं| अंग्रेजी में इसी को प्रेक्टिकल होना कहा जाता है| जैसे कैसे भी कर के अपना लाभ, आराम और मजा बढाने की कला को दुनियादारी का नाम दिया जाता है| अगर हम अपने जीने को ध्यान से देखें तो हम सभी दुनियादारी की इस परिभाषा में पूरी तरह से लिप्त हो चुके हैं तथा इसी दुनियादारी का ही प्रचार प्रसार करने में लगे रहते हैं|

यहाँ तक की हमारी शिक्षा प्रणाली, हमारे माता पिता, हमारे अभिभावक, हमारे आस पास के लोग, हमारा पूरा समाज भी हमें यही दुनियादारी की ही पट्टी पढाते हैं| बचपन से लेकर आज तक हमें यही सिखाया जाता है| बचपन से ही हमें प्रतोयोगिता में छोड़ दिया जाता है, कक्षा में प्रथम आओ, अच्छे अंक लाओ, ज्यादा लोगों को मत बताओ और उनसे जितना हो सके बटोर लो| अब हर बच्चा तो कक्षा में प्रथम आ नहीं सकता, अगर मैंने आप को बता दिया तो आप प्रथम आ जाओगे और मेरे सफल होने के लिए मेरा प्रथम आना जरूरी है| इस प्रणाली में आपसी सहयोग की कोई जगह नहीं है| हर व्यक्ति मेरा प्रतियोगी है, सहयोगी नहीं| ये है हमारी दुनियादारी| पूरी की पूरी शिक्षा में यही है, पैसा और प्रतिष्ठा कमाने की होड़, चाहे वो प्राइमरी स्कूल की पढाई हो, चाहे वो दसवी के बोर्ड के एक्साम, आई आई टी, कोलेज की पढाई या नौकरी| और इसी को सफलता का नाम दिया जाता है|

यहाँ तक की अभी के सिस्टम में कैसे अपने लाभ, आराम और मजे को बढा लिया जाए इसकी ट्रेनिंग देने के लिए कई सारे शिक्षण संसथान खुल गए हैं| उन शिक्षण संस्थानों में दाखिला पाना बहुत ही ऊंची चीज़ मानी जाती है, सफलता का प्रतीक माना जाता है| वहां पर यही सिखाया जाता है कि जो हो रहा है वो तो सही ही है, उसमें रहते हुए अपने लाभ को कैसे बढाएं| और तो और जो इस लाभ को बढाने की कला में जितना पारंगत हो जाता है उसको उतना ही अधिक पैसा मिलता है, वही समाज में प्रतिष्ठा पा रहा है, वही सफल कहलाया जा रहा है और सबसे बड़ी बात, वही व्यक्ति बाकी लोगों के द्वारा उनके लिए निर्णय लिए जाने के लिए प्रतिनिधि के रूप में चुना जा रहा है, ऊंचे पद पर स्थापित किया जा रहा है| उसी व्यक्ति को प्रेक्टिकल माना जा रहा है, दुनियादारी की कला में पारंगत माना जा रहा है, समझदार माना जा रहा है| यह है हमारी समझदारी और सफलता की परिभाषा|

लाभ और प्रतिष्टा को बढा लेने का हुनर है दुनियादारी| इस दुनियादारी ने हमारे घरों को भी नहीं छोडा| घरों में भी पैसे, जमीन, जागीर को लेकर झगडे चलते रहते हैं| दो भाइयों में पैसे को लेकर लड़ाईयां, प्रतियोगिता और झगडे| फिर उनका अलग अलग घरों में रहने लगना, अलग अलग काम करना| किसके पास ज्यादा है, इस प्रतियोगिता की भावना का और अधिक बढ जाना| पहले अगर घर में एक कार थी, तो अब २ चाहिए| अगर कार का मोडल पुराना हो गया है तो अब नया मोडल चाहिए| पहले पूरे घर में एक कार थी, अब पति पत्नी को अलग अलग कार चाहिए, फिर घर के हर सदस्य को अगल कार चाहिए| अगर पडोसी के पास ज्यादा कारें हैं तो हमें उससे ज्यादा कारें चाहिए|  इसे सम्रद्धि, प्रतिष्ठा तथा प्रगति का प्रतीक मानते हैं| यहाँ तक कहते हैं कि अगर यह सब नहीं करेंगे तो प्रगति कैसे होगी| घर में आपस में लड़ते रहते हैं और कार खरीदने, अधिक से अधिक सुविधा जुटा लेने को प्रगति मानते हैं|

समाज के स्तर पर देखें तो वहां पर भी अधिक से अधिक सुविधा के संग्रह को ही प्रगति का आधार माना जाता है| जिस शहर में जितनी बड़ी इमारतें, चमक दमक, बड़े बड़े शोपिंग मोल हों उसे एक प्रगतिशील शहर मानते हैं| गांवों को पिछडा हुआ मानते हैं| गांव का आदमी जो कि गेहूं उगा रहा है उसको छोटा काम मानते हैं और शहर का आदमी जो केडबरी (चाकलेट) बनाने में लगा है उसे बड़ा काम मानते हैं| किसान आत्महत्या कर रहा है और केडबरी बनाने वाला लाखों में खेल रहा है| ये है हमारा अर्थशास्त्र|

अभी प्रगति का आधार अधिक से अधिक आराम और सुविधा जुटा लेना ही है| इसी मानसिकता ने जन्म दिया है लाभोंमादी अर्थशास्त्र को, भोगोंमादी समाजशास्त्र को और कामोंमादी मनोविज्ञान को|

यह लाभ, भोग और काम के उन्माद ने आज हमें क्या दिया है?
१. प्रकृति में असंतुलन| वातावरण के तापमान का बढ जाना, पेडो का काटना, समुद्र में पानी के स्तर का ऊपर उठना, वातावरण, पानी, हवा का प्रदूषण|
२. समाज में अव्यवस्था| जमाखोरी, जालसाजी, कृत्रिम आभाव कि स्थिति, उत्पादन का आभाव, विनिमय का आभाव, असुरक्षित वातावरण|
३. परिवार में झगडे, अव्यवस्था| सम्रद्धि के भावः का अभाव|
4. स्वयं में पीडा, दुःख, असुरक्षा, भय|

क्या यही हम सब चाहते हैं? मुझे नहीं लगता कि कोई भी इसके लिए हाँ कहेगा|

तो प्रश्न यह खडा होता है कि यह सब हो कैसे गया? इस पर ध्यान देने पर यही समझ में आता है कि यह सब तो इंसान कि ना सामझी से ही हुआ है| उपरोक्त पूरे विश्लेषण से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि लाभ, भोग, और काम को आधार बना का व्यवस्था नहीं लायी जा सकती| इससे ना तो इंसान ही खुश है, ना ही परिवार, ना समाज और ना ही प्रकृति में इससे व्यवस्था सुनिश्चित हो पा रही है|

इंसान ने ही यह आशा लगाई कि लाभ, भोग और काम से वह सुखी हो जायेगा और इस आशा के फलस्वरूप ही उसने इतना बड़ा जंजाल खडा कर दिया और इससे कुछ भी निकल कर नहीं आया| यहाँ पर यह समझना बहुत ही जरूरी हो जाता है कि अगर जो हो रहा है वह नहीं तो फिर क्या? अगर हम ध्यान से देखें तो यह दीखता है कि प्रकृति के स्तर पर जो असंतुलन है, समाज के स्तर पर जो असंतुलन है, परिवार के स्तर पर जो असंतुलन है वह है तो इंसान की, याने की हम लोगों की नासमझी के कारण ही है|

यहाँ पर यह समझना बहुत ही जरूरी हो जाता है की इंसान क्या चाहता है? और वह कैसे पूरा होगा?
इंसान चाहता है सुख, सम्रद्धि, संबंध और इन तीनो की निरंतरता| हर इंसान स्वयं में सुख, परिवार में संबंधों में सामरस्यता, समाज में अभय और प्रकृति में सह-अस्तित्व चाहता है| यही मानव का लक्ष्य है, इसकी तरफ बढना ही प्रगति है, यही सम्रद्धि का आधार है, यही सुख है| अगर हम ध्यान से देखें तो इंसान की इस मूल चाहत के बारे में हमारी शिक्षा प्रणाली में कोई बात नहीं होती जिसके ही कारण आज हम यहाँ पहुच गए हैं| अभी की शिक्षा प्रणाली सिखाती है लाभ, आराम और मजे को कैसे बढाएं, जबकि उसे सिखाना चाहिए स्वयं में व्यवस्था, संबंधों में विश्वास, समाज में व्यवस्था और प्रकृति में संतुलन कैसे सुनिश्चित करें|

Published in: on May 13, 2009 at 12:08 pm Leave a Comment

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