संबंध क्या है?

संबंध एक ऐसी डोर है जिससे इंसान बंधा हुआ है और जिसे तोड़ पाना इंसान के लिए संभव नहीं है|

यह सुन कर आप लोग शायद सोच रहे होंगे कि यह कैसा बेवकूफाना वाक्य है, हम तो रोज़ ही जाने कितने संबंध तोड़ते हैं| हम तो अपनी मर्जी के मालिक है कभी भी संबंध बनाते हैं, जब मजा आना बंद हो जाता है या दूसरा व्यक्ति हमें अच्छा नहीं लगता तो हम संबंध तोड़ देते हैं|

यही हो गया है अभी की मानसिकता में| संबंध भी कोई सोचने लायक मुद्दा है यह हमें पता नहीं है| हमारे लिए सोचने लायक मुद्दे होते हैं गाने, पिच्चर, घूमना फिरना, पैसा प्रतिष्ठा कमाना, आलीशान घर, बड़ी गाडी, सेक्स आदि| इन्ही में हमारा जीवन चलता है| इससे ऊपर भी कुछ हो सकता है ना तो हमें ये पता है और ना ही इसके ऊपर हमें कुछ दीखता है| अभी की मानसिकता में जो चीज़ बड़ी ही प्रबल है वह है, लाभ, आराम और मजा| किस तरह से हम अपने लाभ को, आराम को और मजे को बढाएं यही हमारी मानसिकता में दिन रात दौड़ता है, इसी पर हम सोच विचार करते हैं, यही हमारे जीवन का लक्ष्य बना रहता है| यहाँ तक कि हम अपने आस पास के लोगों को भी एक लाभ, आराम और मजा बढाने के स्रोत की तरह देखते हैं| जब तक हमें लगता है कि फलाने व्यक्ति से लाभ, आराम या मजा बढेगा तब तक ही हम उस व्यक्ति का सान्निध्य प्राप्त करना चाहते हैं, उससे संबंध बनाना चाहते हैं| जब हमें लगने लगता है कि अब इस व्यक्ति से हमारे लाभ, आराम, मजे में बढोत्तरी नहीं होगी तब हमें उस व्यक्ति के सान्निध्य में कोई रूचि नहीं रहती| हम उसे छोड़ देते हैं| जिसे अभी हम संबंध कहते हैं उसका आधार भी अभी लाभ, आराम और मजा ही बना रहा है|

अभी हम संबंध किस तरह से बनाते हैं और किस तरह से हमारे संबंधों का आधार लाभ, आराम और मजा बना रहता है इसके कई सारे उदाहरण देखे जा सकते हैं| दूसरे व्यक्ति का दिखने में सुन्दर होना, उसका धनवान होना, समाज में प्रतिष्ठित होना, उसका कई प्रतिष्ठित लोगों से संपर्क होना, उसके द्वारा हम पर विश्वास किया जाना, उसके द्वारा हमारा सम्मान किया जाना, उसके द्वारा हम पर ध्यान दिया जाना, उसका हमें समझना, उसका समझदार होना, उसका ऊंचे पद पर विराजमान होना इत्यादि| अभी हमारे संबंधों में किसी ना किसी तरह की लाभ, आराम और मजे से जुडी हुई अपेक्षा बनी ही रहती है| जब तक हमें लगता है कि हमारी यह अपेक्षा पूरी होने कि संभावना है या पूरी हो रही है तब तक हम संबंध को बनाये रखते हैं और जब हमें लगता है कि अब यह संभावना नहीं है तो हम संबंध को तोड़ देते हैं या दूरियां बढा लेते हैं| और तो और इसी को सही भी मानते हैं, इसी का प्रचार प्रसार भी करते हैं, इसी को दुनियादारी का नाम देते हैं और इसी को अंग्रेजी में प्रैक्टिकल होना भी कहा जाता है|

लाभ, आराम और मजा इन तीनो ने हमारी आँखों को इस तरह से चौंधिया के रखा है कि इनसे ऊपर भी कोई चीज़ हो सकती है हमें पता ही नहीं चलता| हमारा संबंध बनाने का आधार भी यही होता है और हम दूसरों के हमारे प्रति संबंध के भावः को भी इसी तरह से देखते हैं| जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि| लाभ, आराम और मजा बढाने का प्रलोभन ही हमें संबंध बनाने कि लिए प्रेरित करता है तथा अगर दूसरे हमसे संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हों तो हम उन्हें भी इसी शख कि निगाह से देखते हैं कि इसमें भी जरूर ही इनका कोई ना कोई स्वार्थ होगा, प्रलोभन होगा| अगर हमें लगता है कि हमारे दूसरे व्यक्ति से व्यवहार ठीक नहीं होने पर भी दूसरा व्यक्ति हमसे संबंध बनाने कि कोशिश कर रहा है तो या तो उसका प्रलोभन काफी प्रबल है या फिर उसको कोई भय है| भय और प्रलोभन से ऊपर हमारी दृष्टि जाती ही नहीं है| हमें बस इतना ही दीखता है कि या तो इंसान को प्रलोभन कुछ करने के लिए प्रेरित करता है या फिर भय| भय या प्रलोभन के अलावा किसी व्यक्ति के पास कुछ करने के लिए कोई प्रेरणा ही नहीं हो सकती, ऐसा अभी हम मानते हैं|

यहाँ पर यह तो बहुत ही आराम से देखने में आता है कि भय या प्रलोभन के आधार पर बने हुए संबंध में स्वीकृति के भावः की निरंतरता नहीं रहती| बल्कि इस तरह के संबंध में स्वीकृति का आधार प्रलोभन ही रहता है| भय और स्वीकृति तो एक साथ हो ही नहीं सकते| जब तक प्रलोभन बना रहता है स्वीकृति बनी रहती है| यहाँ तक कि प्रलोभन के आधार पर स्वीकृति असलियत में काफी सामायिक और सतही रहती है| इस तरह की स्वीकृति का आधार दूसरा व्यक्ति नहीं बल्कि उससे जुड़ा हुआ प्रलोभन ही रहता है|

अगर हम अपने आप को ध्यान से देखें तो हमें यह देखने में आता है कि हमारी किसी भी संबंध में दूसरे व्यक्ति से क्या अपेक्षाएं रहती हैं| जिन लोगों को हम अपने करीब मानते हैं उन लोगों के साथ संबंध में जुडी हुई अपेक्षाएं काफी आसानी से पकडाई में आ जाती हैं| हमारी किसी भी संबंध में निरपेक्ष स्वीकृति की अपेक्षा रहती है| हमारी अपेक्षा रहती है कि दूसरा व्यक्ति हमें स्वीकार ले और स्वीकारे ही रहे| उसकी स्वीकृति हमारे लिए बनी ही रहे| स्वीकृति को अगर हम और खोल कर देखें तो हमारी दूसरे व्यक्ति से यह अपेक्षा रहती है कि वह हम पर विश्वास करे, हमारा सम्मान करे, हमारा सही मूल्यांकन करे, हमें समझे और उसकी हमारे प्रति स्वीकृति बनी ही रहे| अगर हमें उनसे स्वीकृति में जरा सी भी कमी या गडबडी नज़र आती है तो हम परेशान हो जाते हैं| हमारी अपेक्षा रहती है कि वापस से सब पहले जैसा ही हो जाए| संबंध में विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीना ही हर मनुष्य को सहज रूप से स्वीकार है| हर इंसान विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीना चाहता है पर उसमें विश्वास तथा सम्मान कि समझ नहीं होती| इसके कारण ना तो वो खुद ही सुखपूर्वक जी पाता है और ना ही दूसरे को जीने देता है|

अभी की मानसिता में क्यूंकि लाभ, आराम और मजा इतनी बुरी तरह से भरा हुआ है कि संबंध में हमारी कुछ अपेक्षाएं भी हैं ये हमें पता ही नहीं चलता| बल्कि अगर हम ध्यान से देखें तो संबंध में जो हमारी अपेक्षाएं है वो हम में निरंतर बनी रहती हैं| संबंध में जीने कि अपेक्षा हम में निरंतर बनी रहती है| जबकि लाभ, आराम और मजे से मिलने वाले सुख कि निरंतरता नहीं बनी रहती| अगर संबंध सही नहीं हों तो लाभ, आराम और मजा भी हमें निरर्थक लगने लगता है| इसके काफी सारे उदाहरण देखे जा सकते हैं| अगर संबंध सही न हो तो हमें अच्छा खाना अच्छा नहीं लगता, घूमने फिरने में हमें मजा नहीं आता, काम में मन नहीं लगता, हम परेशानी में बने रहते हैं| अगर संबंध अच्छे हों तो हमें काम में ज्यादा मजा आता है, मन लगा कर हम काम कर पाते हैं, ज्यादा उर्जित महसूस करते हैं|

अभी संबंध के प्रति हमारी संवेदनशीलता विकसित नहीं रहती| संबंध में कुछ निरपेक्ष या बेशर्त भी हो सकता है यह हमें पता नहीं रहता| जबकि अगर हम ध्यान से देखें तो संबंध में अगर शर्त है तो उसमें भावः की निश्चितता, स्थिरता नहीं बनी रहती| संबंध में यह स्वीकृति का भावः ही हमारे सुख का आधार बना रहता है| जब भी हम में दूसरे व्यक्ति के प्रति अस्वीकृति का भावः आता है तो हम परेशान होते हैं और दूसरे व्यक्ति को परेशान करने की योजनायें बनाने लगते हैं| यह पूरी ही प्रक्रिया खुद में काफी पीडादायक होती है| यहाँ पर यह काफी आसानी से देखने में आता है कि दूसरे व्यक्ति के प्रति अस्वीकृति का भावः इंसान को सहज रूप से स्वीकार नहीं होता| अक्सर दूसरे व्यक्ति के प्रति हमारी स्वीकृति दूसरे व्यक्ति की हमारे प्रति स्वीकृति के ऊपर निर्भर रहती है| अगर हमें लगता है की दूसरा व्यक्ति हमें स्वीकारता है तो हम में उसके प्रति स्वीकृति का भावः बनने लगता है| अगर हमें ऐसा लगता है कि दूसरा व्यक्ति हमारे बारे में अच्छा नहीं सोचता, हमारा बुरा चाहता है तो हम में उसके प्रति अस्वीकृति का भावः आने लगता है| जैसे ही हमारे अन्दर यह अस्वीकृति का भावः आया और हम परेशान हुए|

यहाँ पर इस स्वीकृति को समझना अत्यंत ही आवश्यक हो जाता है| अभी हमारी दूसरे व्यक्ति के प्रति स्वीकृति लाभ, आराम या मजे को ध्यान में रख कर बनी रहती है| जिसके कारण जब तक हमें लगता है कि दूसरे व्यक्ति से हमारा लाभ, आराम या मजा बढेगा हम उसको स्वीकारते हैं और फिर छोड़ देते हैं| इस तरह की प्रणाली में संबंध भी एक लाभ, आराम और मजे का साधन ही बना रहता है जिसमें इंसान खुद तो दुखी रहता ही है और दूसरों को भी दुखी करता है|

जैसा कि हमने देखा ही था कि स्वीकृति का अर्थ है दूसरे व्यक्ति के प्रति विश्वास तथा सम्मान| विश्वास तथा सम्मान के समझ के अभाव में ही हम में स्वीकृति के भावः में अनिश्चितता बनी रहती है| यह अनिश्चितता ही हमारे दुखों का कारण बनती है| स्वीकृति, विश्वास तथा सम्मान को समझने के लिए हमें ज्ञान चाहिए| ज्ञान का अर्थ है, जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, तथा मानवीयता पूर्ण आचरण का ज्ञान|

संबंध तो इंसान और इंसान में है ही, उसे बनाना नहीं है बस पहचानना है| संबंध की इस पहचान के अभाव में ही हम दुखी होते हैं और संबंधों को बोझ की तरह देखते हैं|

Published in: on May 13, 2009 at 12:12 pm Leave a Comment

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