पैसा और प्रतिष्ठा कमाने के लिए| पैसा और प्रतिष्ठा कमाने के लिए ही हमारी सारी पढाई हो रही है| बचपन से लेकर आज तक वही एक उद्देश्य हमारी पढाई के लिए रहा है|
पैसा और प्रतिष्ठा ही क्युकि हमारी पढाई का उद्देश्य है इसलिए जिन विषयों से हमें ऐसा लगता है कि हमें पैसा और प्रतिष्ठा कमाने में अधिक सहायता मिलेगी हम उन विषयों में संलग्न हो जाना चाहते हैं| कौन से विषय से कितना पैसा कमाया जा सकता है यह उस विषय के बाजार में मांग पर निर्भर करता है| अगर आजकल सोफ्टवेयर का बाजार में बहुत अधिक चलन है और उससे पैसा कमाने की अच्छी गुंजाईश उपलब्ध है तो अधिक से अधिक लोग सोफ्टवेयर इंजिनियर बन जाना चाहते हैं| पूरा समाज, लोग, उनके सोचने का नजरिया उसी हिसाब से बदल जाता है| माता पिता अपने बच्चों को फिर सोफ्टवेयर इंजिनियर ही बनाना चाहते हैं| बच्चों को भी पता नहीं होता कि वो क्या पढने जा रहे हैं| उनको तो बस इतना ही पता होता है कि सोफ्टवेयर इंजिनियर बन कर ही सफल, सम्रद्ध हुआ जा सकता है जिसके कई सारे उदाहरण तो उनके सामने उपलब्ध रहते ही हैं|
सफलता, सम्रद्धि की इन्ही मान्यताओं के आधार पर वे उन विषयों को पढने लगते हैं जिनके बारे में उन्हें कुछ पता भी नहीं होता| उन्हें तो बस इतना पता होता है कि ये विषय पढ़ कर ही अच्छी आजीविका कमाई जा सकती है, समाज में प्रतिष्ठा कमाई जा सकती है, सफल हुआ जा सकता है और एक सुरक्षित जीवन जिया जा सकता है| उनकी यह अपेक्षा गलत भी नहीं है, पर क्यूंकि वे जो विषय पढ़ रहे होते हैं उनमें उन्हें रूचि नहीं होती तो उन विषयों को पढने का उद्देश्य सिर्फ अच्छे नंबर लाना ही रह जाता है, ताकि उनको बाद में अच्छी नौकरी और और प्रतिष्ठा मिल सके| इसके कारण पढाई करने की यह यात्रा बड़ी ही कठिन हो जाती है| जिन विषयों को पड़ने में मेरा मन नहीं लगता उनको पढने के लिए मुझे काफी रटना पड़ता है, जो अपने आप में काफी दुःखदाई काम है| कई लोग पढ़ नहीं पाते अच्छे नंबर नहीं ला पाते तो उनके माता पिता परेशान हो जाते हैं| वे खुद भी काफी दबाव में आ जाते हैं| आसपास के लोग क्या कहेंगे, अच्छी नौकरी लगेगी या नहीं और भी कई सारी अनिश्चितताएं उनको और उनके माता पिता को परेशान करने लगती हैं, जो की काफी स्वाभाविक है|
यहाँ पर अगर ध्यान से देखा जाए तो यही देखने में आता है कि हमने अपने आसपास जो भी मोडल, वातावरण बनाया हुआ है उसमें अधिक पैसा और प्रतिष्ठा कमाना ही मूल उद्देश्य नज़र आता है| इस मोडल में भी काफी अस्थिरता अनिश्चितता बनी रहती है| आज जो विषय बाजार में मांग पर है, जरूरी नहीं की कल वह मांग में रहे ही| देखने में आता ही है कि किस तरह सोफ्टवेयर का बाजार हिलता डुलता रहता है| जरा सा बाजार हिला और आपकी आजीविका और प्रतिष्ठा दाव पर आ गयी| एक चीज़ और जो होती है वह यह है कि जिस विषय की बाजार में मांग होती है उस विषय से जुड़े हुए काम में लगे लोगों को अधिक पैसा तो मिलता ही है साथ ही उसे बाकी कामों से अधिक प्रतिष्ठित काम भी मान लिया जाता है| जिसके कारण अधिक से अधिक लोग उसमें आ जाना चाहते हैं| गांवों से लोग अपने बच्चों को शहरों में पढाई के लिए भेजते हैं ताकि वे भी अधिक पैसा और प्रतिष्ठा कमा सकें| गांवों में ऐसा नहीं है कि उनके पास संसाधनों की कमी होती है| बल्कि गाँव में उन्हें पर्याप्त भोजन की आश्वस्ति, गाय का असली दूध, रहने की अच्छी जगह आदि सब चीज़ों की आश्वस्ति होती है, पर वे शहर में आ जाना चाहते हैं| प्रचलित मान्यताओं के आधार पर पैसा और प्रतिष्ठा पाना चाहते हैं| गांव के वो लोग जो अपने गांव में राजा या मालिक की तरह रहते थे वे शहर में आकर भिखारियों जैसा जीवन व्यतीत करते हैं| ना तो पैसा ज्यादा कमा पाते हैं, प्रतिष्ठा तो बहुत ही दूर की बात है| यह लाभ तथा प्रतिष्ठा का उन्माद उन्हें कहीं का छोड़ता|
नौकरी में आ जाने के बाद भी नौकरी करने का उद्देश्य केवल पैसा और प्रतिष्ठा कमाना ही रहता है| दफ्तर जाना, वापस आना, सोना, फिर दूसरे दिन वापस जाना, पैसा इकट्ठा करना, लोन चुकाना, हफ्ते के आखिरी दिनों में घूमना फिरना, बस इतना ही रह जाता है जीवन|
अगर हम ध्यान से देखें तो यहाँ तक कि आज शिक्षा के नाम पर जो दिया जा रहा है वह भी अधिक से अधिक पैसा और प्रतिष्ठा कमाने की ट्रेनिंग ही दी जा रही है| जिसके कारण ही आज यह स्थिति आ गयी है कि अर्थशास्त्र लाभुन्माद पर आधारित है, समाजशास्त्र भोगुन्माद पर और मनोविज्ञान कामुन्माद पर| शिक्षा का असली प्रयोजन लोगों की नौकरियां लगवाना नहीं बल्कि समझदार, इमानदार, जिम्मेदार इंसान बनाना है|
हर इंसान की जन्म से ही कुछ मूलभूल आवश्यकताएं होती है जिनकी सही पहचान उसको खुद को ही नहीं रहती जिसके कारण ही सारी समस्याओं का जन्म होता है| जैसे,
१. हर इंसान सुखपूर्वक जीना चाहता है पर उसे सुख क्या है और वह कैसे सुनिश्चित होगा इसकी समझ नहीं होती|
२. हर इंसान जन्म से ही अपने आसपास के लोगों से निरपेक्ष स्वीकृति की अपेक्षा रखता है, उसकी यह अपेक्षा रहती है कि उसके आस पास के लोग उस पर विश्वास करें, उसका सम्मान करें और किये ही रहे, पर उसमें स्वयं में अपने आसपास के लोगों को स्वीकृति प्रदान करने तथा व्यवहारिक रूप से मिल जुलकर काम करने की योग्यता नहीं रहती|
३. हर इंसान जन्म से ही सत्यवक्ता है, सही कार्य व्यवहार करना चाहता है पर उसमें सही व्यवहार तथा कार्य कर पाने की योग्यता नहीं रहती|
४. हर इंसान बचपन से ही ज्ञान का प्यासा है पर उसे ज्ञान का अर्थ स्पष्ठ नहीं रहता, वह अपनी इस प्यास से अनभिज्ञ रहता है और हमारी अभी की शिक्षा प्रणाली, समाज, माता पिता उस प्यास की हत्या कर देते है|
हमारी अभी की जो शिक्षा प्रणाली है उसमें उपरोक्त ४ में से किसी भी विषय पर बात नहीं होती| जबकि ये ४ मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं है| इन आवश्यकताओं के पूरा ना हो पाने के कारण ही इंसान में असंतुष्टि बनी रहती है जिसे पूरा करने के लिए वह कई सारे गलत काम करने को भी तैयार हो जाता है|
यहाँ पर यही समझ में आता है कि शिक्षा का असली प्रयोजन इंसान में सही करने कि योग्यता को विकसित करना है ना कि पैसा कमाने कि योग्यता को विकसित करना| इसे करने के लिए शिक्षा में इंसान और उससे जुडी हुई आवश्यकताओं पर बात होना अत्यंत आवश्यक है|